
होली के बाद सातवें और आठवें दिन शीतला माता की पूजा करने की परंपरा है। इन्हें शीतला सप्तमी या शीतलाष्टमी कहा जाता है। वहीं कुछ जगहों पर होली के बाद पहले सोमवार या गुरुवार को ही इनकी पूजा की जाती है. शीतला माता का उल्लेख स्कंद पुराण में मिलता है। पौराणिक मान्यता है कि इनकी पूजा और व्रत करने से चेचक के साथ-साथ अन्य प्रकार के रोग और संक्रमण नहीं होते हैं।
शीतला सप्तमी और अष्टमी
पुरी के ज्योतिषी डॉ. गणेश मिश्रा का कहना है कि देश में कहीं चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी को शीतला माता की पूजा की जाती है तो कहीं अष्टमी को। इस बार ये तिथियां 24 और 25 मार्च को होंगी। सप्तमी तिथि के स्वामी सूर्य हैं और अष्टमी के देवता शिव हैं। दोनों ही उग्र देवता होने के कारण इन दोनों तिथियों में शीतला माता की पूजा की जा सकती है। निर्णय सिंधु के पाठ के अनुसार इस व्रत में सूर्योदय की तिथि ली जाती है. इसलिए सप्तमी का पूजन और व्रत गुरुवार के दिन करना चाहिए। वहीं शुक्रवार को शीतलाष्टमी मनाई जाएगी।
इस व्रत में ही ठंडा खाने की परंपरा
शीतला माता का व्रत ऐसा है जिसमें शीतल अर्थात ठंडा भोजन किया जाता है। इस व्रत में एक दिन पहले तैयार भोजन करने की परंपरा है। इसलिए इस व्रत को बसोड़ा या बसियौरा भी कहा जाता है। ऐसा माना जाता है कि बदलते मौसम के साथ खान-पान में बदलाव करना चाहिए। इसलिए ठंडा खाना खाने की परंपरा बनाई गई है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार इस व्रत में शीतला माता की पूजा और ठंडा खाने से संक्रमण व अन्य रोग नहीं होते हैं।
रोगों से बचने के लिए उपवास
माना जाता है कि देवी शीतला चेचक और खसरा जैसी बीमारियों को नियंत्रित करती हैं और लोग उन बीमारियों को दूर करने के लिए उनकी पूजा करते हैं।
गुजरात में, कृष्ण जन्माष्टमी से ठीक एक दिन पहले बसोड़ा के समान एक अनुष्ठान मनाया जाता है और इसे शीतला सतम के नाम से जाना जाता है। शीतला सतम भी देवी शीतला को समर्पित है और शीतला सप्तमी के दिन ताजा भोजन नहीं बनाया जाता है।
