
नई दिल्ली/दुबई, 28 फरवरी:
खाड़ी देशों की तीखी प्रतिक्रिया और चिंता
ईरान की इस सैन्य कार्रवाई के बाद खाड़ी देशों की प्रतिक्रिया काफी आक्रामक रही है। सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने एक आधिकारिक बयान जारी कर कहा कि इस तरह के हमले न केवल क्षेत्रीय संप्रभुता का उल्लंघन हैं, बल्कि यह पूरे वैश्विक ऊर्जा बाजार और समुद्री व्यापार मार्गों के लिए भी एक बड़ा खतरा हैं।
संयुक्त अरब अमीरात ने भी इस घटना की कड़े शब्दों में निंदा की है। यूएई का मानना है कि इस तरह के उकसावे वाले कदम क्षेत्र में वर्षों से चल रहे शांति प्रयासों को पीछे धकेल सकते हैं। खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के देशों ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई है ताकि ईरान की बढ़ती सैन्य गतिविधियों के खिलाफ एक साझा रणनीति तैयार की जा सके।
हमले का कारण और सैन्य प्रभाव
ईरान का दावा है कि ये हमले उसकी सुरक्षा और हितों की रक्षा के लिए किए गए थे, लेकिन स्वतंत्र विशेषज्ञों का मानना है कि यह शक्ति प्रदर्शन क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की एक कोशिश है। ड्रोन और मिसाइलों के इस जखीरे ने कई रक्षा प्रणालियों को चुनौती दी है। हालांकि, अधिकांश हमलों को बीच रास्ते में ही रोक दिया गया, लेकिन इसके मनोवैज्ञानिक और आर्थिक प्रभाव गहरे हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि ईरान इसी तरह की कार्रवाई जारी रखता है, तो अमेरिका और उसके सहयोगियों की सक्रिय भागीदारी अपरिहार्य हो जाएगी। इससे न केवल इजरायल और ईरान के बीच सीधा टकराव बढ़ेगा, बल्कि लेबनान, यमन और इराक जैसे पड़ोसी देश भी इस युद्ध की आग में झुलस सकते हैं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल
मध्य पूर्व में अस्थिरता का सीधा मतलब है वैश्विक तेल की कीमतों में उछाल। जैसे ही ईरान के हमलों की खबर वैश्विक मीडिया में आई, ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतों में तत्काल वृद्धि देखी गई। खाड़ी देश दुनिया के सबसे बड़े तेल निर्यातक हैं, और होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) जैसे महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग इस तनाव के केंद्र में हैं। यदि यहाँ सैन्य गतिविधि बढ़ती है, तो वैश्विक सप्लाई चेन बुरी तरह प्रभावित हो सकती है, जिससे भारत सहित कई देशों में महंगाई बढ़ना तय है।
अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय का रुख
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इस घटनाक्रम पर पैनी नजर रखी हुई है। व्हाइट हाउस की ओर से जारी संकेतों के अनुसार, अमेरिका अपने सहयोगियों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाने पर विचार कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने भी इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए एक विशेष सत्र बुलाया है। रूस और चीन जैसे देशों ने भी संयम बरतने की अपील की है, लेकिन ईरान के बढ़ते तेवर किसी बड़े समझौते की संभावना को कम कर रहे हैं।
शांति की अपील या युद्ध की तैयारी?
जहाँ एक ओर कतर और ओमान जैसे देश मध्यस्थता की कोशिश कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर इजरायल ने स्पष्ट कर दिया है कि वह अपनी सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं करेगा। इजरायल की ओर से जवाबी कार्रवाई की धमकी ने तनाव को और बढ़ा दिया है। खाड़ी देश अब इस दुविधा में हैं कि वे ईरान के साथ कूटनीतिक संबंधों को बचाए रखें या अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका के सैन्य छाते के नीचे और अधिक सक्रिय हो जाएं।
निष्कर्षतः, ईरान के इन हमलों ने मध्य पूर्व के नक्शे पर एक नई अस्थिरता पैदा कर दी है। आने वाले कुछ दिन वैश्विक राजनीति और सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होने वाले हैं।
