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प्रेम पर लिखी कुछ कवियों की कविताएं

प्रेम अंतर्मन को छूने की एक अद्भुत कला है।प्रेम कोमल अनुभूतियों का अप्रतिम एहसास है।प्रेम में डूबने वाला,उसमें और डूबना चाहता है।प्रेम को लेकर अनेक कवियों ने कविताएं लिखीं हैं।प्रेम के अनेक पहलुओं को इन कवियों की कविताओं में देख सकते हैं। आज वैलेंटाइन डे के दिन प्रेम पर लिखी कुछ कवियों की कविताएं साझा कर रहे हैं युवा आलोचक नीरज कुमार मिश्र

(१).चम्पई आकाश तुम हो – केदारनाथ अग्रवाल

“चम्पई आकाश तुम हो
हम जिसे पाते नहीं
बस देखते हैं ;
रेत में आधे गड़े
आलोक में आधे खड़े।”

(२).जो तुम आ जाते एक बार – महादेवी वर्मा

“जो तुम आ जाते एक बार

कितनी करूणा कितने संदेश
पथ में बिछ जाते बन पराग
गाता प्राणों का तार तार
अनुराग भरा उन्माद राग

आँसू लेते वे पथ पखार
जो तुम आ जाते एक बार

हँस उठते पल में आर्द्र नयन
धुल जाता होठों से विषाद
छा जाता जीवन में बसंत
लुट जाता चिर संचित विराग

आँखें देतीं सर्वस्व वार
जो तुम आ जाते एक बार।”

(३).आदर्श प्रेम – हरिवंशराय बच्चन

“प्यार किसी को करना लेकिन
कह कर उसे बताना क्या
अपने को अर्पण करना पर
और को अपनाना क्या

गुण का ग्राहक बनना लेकिन
गा कर उसे सुनाना क्या
मन के कल्पित भावों से
औरों को भ्रम में लाना क्या

ले लेना सुगंध सुमनों की
तोड़ उन्हें मुरझाना क्या
प्रेम हार पहनाना लेकिन
प्रेम पाश फैलाना क्या

त्याग अंक में पले प्रेम शिशु
उनमें स्वार्थ बताना क्या
दे कर हृदय हृदय पाने की
आशा व्यर्थ लगाना क्या।”

(४).थरथराता रहा – शमशेर बहादुर सिंह

’एक विचित्र प्रेम अनुभूति’

थरथराता रहा जैसे बेंत
मेरा काय…कितनी देर तक
आपादमस्तक
एक पीपल-पात मैं थरथर ।
काँपती काया शिराओं-भरी
झन-झन
देर तक बजती रही
और समस्त वातावरण
मानो झंझावात
ऐसा क्षण वह आपात
स्थिति का।”

(५) नामांकन – रामधारी सिंह “दिनकर”

“सिंधुतट की बालुका पर जब लिखा मैने तुम्हारा नाम
याद है, तुम हंस पड़ीं थीं, ‘क्या तमाशा है
लिख रहे हो इस तरह तन्मय
कि जैसे लिख रहे होओ शिला पर।
मानती हूं, यह मधुर अंकन अमरता पा सकेगा।
वायु की क्या बात? इसको सिंधु भी न मिटा सकेगा।’

और तबसे नाम मैने है लिखा ऐसे
कि, सचमुच, सिंधु की लहरें न उसको पाएंगी,
फूल में सौरभ, तुम्हारा नाम मेरे गीत में है।
विश्व में यह गीत फैलेगा
अजन्मी पीढ़ियां सुख से
तुम्हारे नाम को दुहराएंगी।”

(६) रचना – अशोक वाजपेयी

“कुछ प्रेम
कुछ प्रतीक्षा
कुछ कामना से
रची गई है वह,
— हाड़माँस से तो
बनी थी बहुत पहले।”

(७).बारिश : चार प्रेम कविताएँ-3 – स्वप्निल श्रीवास्तव

“एक दिन मैं तुम्हें
भीगता हुआ देखना चाहता हूँ
प्रिये
बरिश हो और हवा भी हो
झकझोर
तुम जंगल का रास्ता भूल कर
भीग रही हो
एक निचाट युवा पेड़ की तरह
तुम अकेले भीगो
मैं भटके हुए मेघ की तरह
तुम्हें देखूँ
तुम्हें पता भी न चले कि
मैं तुम्हें देख रहा हूँ
फूल की तरह खिलते हुए
तुम्हारे अंग-अंग को देखूँ
और मुझे पृथ्वी की याद आए।”

(८). पर आँखें नहीं भरीं – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

“कितनी बार तुम्हें देखा
पर आँखें नहीं भरीं।

सीमित उर में चिर-असीम
सौंदर्य समा न सका
बीन-मुग्ध बेसुध-कुरंग
मन रोके नहीं रुका
यों तो कई बार पी-पीकर
जी भर गया छका
एक बूँद थी, किंतु,
कि जिसकी तृष्णा नहीं मरी।
कितनी बार तुम्हें देखा
पर आँखें नहीं भरीं।

शब्द, रूप, रस, गंध तुम्हारी
कण-कण में बिखरी
मिलन साँझ की लाज सुनहरी
ऊषा बन निखरी,
हाय, गूँथने के ही क्रम में
कलिका खिली, झरी
भर-भर हारी, किंतु रह गई
रीती ही गगरी।
कितनी बार तुम्हें देखा
पर आँखें नहीं भरीं।”

(९). प्रेम क्या है ? – विमल कुमार

“प्रेम
दूसरे को जानना भी है
ख़ुद को पहचानना भी है
ग़लत को ग़लत
सही को सही
मानना भी है
प्रेम गुसलख़ाने में
गाना भी है
नहाना भी है
किसी को अपने घर
खाने पर बुलाना भी है
किसी का दुख-दर्द सुनना
और अपना बताना भी है
प्रेम
अपना हाथ देकर
किसी को उठाना भी है
काँटे हमें कहीं
तो उसे निकालना भी है
पत्थर है कोई रास्ते में
तो उसे हटाना भी है ।
प्रेम
अगर मान-मनौव्वल है
तो कुछ
उलाहना भी है ।
प्रेम
ज़िन्दगी भर का हिसाब है
जोड़कर
उसमें कुछ घटाना भी है ।
प्रेम जितना जताना भी है
उतना छिपाना भी है ।
प्रेम में आँसू बहाना भी है
मुस्कराना भी है।”

(१०) .आग और प्रेम – सुभाष राय

“आग की ही तरह
जन्म लेता है प्रेम
पहले कुछ सुलगता है
फिर भभक कर जल उठता है
सब कुछ जगमग-जगमग हो उठता है

बंद आंखों के भीतर
छिटकने लगते हैं सात रंग
देश- काल नहा उठता है
एक अनाविल उजास में

एक पल में सब कुछ बदल जाता है
रेगिस्तान में उग आते हैं फूलों के द्वीप
बिना मेह बरसता है आकाश
खेत लहलहा उठते हैं विविध रूप-रंग में
बसंत उतर आता है बारहमासी

भूख-प्यास लगती नहीं
मन भरा रहता है हमेशा
सूरज डूबता ही नहीं

एक अरूप असंख्य
चिनगारियों में फूट पड़ता है
आग में ही बदल जाता है समूचा अस्तित्व
पिघलकर भी बहता नहीं
जलकर भी जलता नहीं।”

 

(११).प्यार के किस्से सुनने वाला कोई नहीं था -मिथिलेश श्रीवास्तव

“मैं भाग निकला क्योंकि शाम होते ही
मुझे अपने प्रेम के किस्से सुनाने का दिल करने लगता है
मैं भाग आया घर
मुझे घर का रास्ता मालूम था
प्यार के किस्से सुनने वाला यहाँ भी कोई नहीं था।”

(१२). मिलना – विनय विश्वास

“मैं
अपने को ढूंढ़ रहा था
कि मिली तुम
अपने को ढूंढ़तीं।”

(१३). तुम्हें प्यार करता हूँ:एक – राकेशरेणु

तुम्हें प्यार करता हूँ
क्योंकि तुम पृथ्वी से प्यार करती हो
मैं तुममें बसता हूँ
क्योंकि तुम सभ्यताएं रचती हो।…
भाषा की जड़ों में तुम हो
हर विचार,हर दर्शन तुमसे
हर खोज,हर शोध की वजह तुम हो
सभ्यता की कोमलतम भावनाएं तुमसे
कुम्हार से तुमसे सीखा सिरजना
मूर्तिकार की तुम प्रेरणा
चित्रकार के चित्रों में तुम हो
हर दुआ,दुलार तुमसे
नर्तकी का नर्तन तुम।
संगतकार का वादन
रचना का उत्कर्ष तुम हो ।
मैं तुममें बसता हूँ
क्योंकि तुम सभ्ताएं सिरजती हो।”

(१४). प्रेम करते हुए – जितेंद्र श्रीवास्तव

“प्रेम करते हुए हमने
नहीं पढ़ीं प्रेम की कविताएँ
हमने पढ़ीं एक -दूसरे की पुतलियाँ
हमने उँगलियों से बिखराईं-सँवारीं
एक -दूसरे की लटें
एक-दूसरे के चेहरे को हाथों में लेकर
सुबह के सिंदूरी सूर्य की तरह निहारा
एक-दूसरे के साथ चलते हुए
चाँद को अँगुरी में भर लिया
एक-दूसरे से ठिठोली की
मन भर लड़े
एक दूसरे के गले में गला डाल खड़े रहे देर तक
हम मिलते रहे
सागर की लहरों जैसे
मचलते रहे एक-दूसरे की बाँहों में
पहचानते रहे एक-दूसरे के होंठ
एक-दूसरे के शरीर
एक-दूसरे का सपना
हम घुलते रहे एक-दूसरे में
धीरे-धीरे लगा
हमने रचा है कुछ एक-दूसरे में

प्रेम करते हुए हमने जाना
प्रेम करते हुए लोग
रचते हैं कविताएँ एक-दूसरे में
एक-दूसरे का होना
उनकी कविता का पूरा होना है।”

(१५). प्यार – देवेंद्र आर्य

जब हम कुछ नहीं कर रहे होते
तो प्यार करते हैं

जब हम प्यार करते हैं
तो कुछ नहीं कर रहे होते सिवा प्यार के

प्यार करना छुट्टी मनाना नहीं है
न ही कुछ नहीं करना प्यार करना है

कभी कभी बहुत कुछ करते हुए भी
हम प्यार करते हैं
तब ऐसे में हम सब कुछ कर रहे होते हैं
सिवा प्यार के

प्यार एक सार्वजनिक क्रिया है
जिसे व्यक्तिगत रूप से किया जाता है।

(१६). वे हमारे लिए भीतर बैठी हमारे लिए स्वेटर बुन रही हैं – नरेंद्र पुंडरीक

“यह उनमें भी नहीं थी
जिनकी आंखों की बुलाहट में
हमें नदी नाले आग पानी कुछ भी नहीं दिखाई देते थे
यह वह भी नहीं थी
जिनके लिए हमारी लंबी रातें छोटी होकर
आंखों में ही रीत जाती थीं
यह उनमें भी नहीं थी
जिनसे कभी इतनी बातें की थीं
अब यह निश्चय है कि अब हम जो करेंगे
और यह को है इसे कभी दिखाई नहीं देगा कि वे
हमारे भीतर बैठी हमारे लिए स्वेटर बुन रही है।”

(१७). प्रेम – मणि मोहन

“तुम्हारी देह के भीतर
तैर रही हैं
असंख्य रंगीन मछलियां
तैर रहे हैं
कुछ टूटे हुए स्वप्न
कुछ सितारे
कुछ टूटे हुए इन्द्रधनुष
तुम्हारी देह के भीतर
एक तिनके के सहारे
मैं भी तैर रहा हूँ
तुम्हारी देह के भीतर।”

(१८). प्यार – कौशल किशोर

उसने पूछा
कैसा होता है प्यार?
क्या आकाश से ऊँचा
पाताल से गहरा
शीशे सा पारदर्शी
जल कल सा साफ स्वच्छ
क्या ऐसा होता है प्यार?..
मत बांधो
चंद रिश्तों का नाम नहीं है
हर बन्धन में कसमसाता
छटपटाता
मुक्ति की तमन्ना लिए
बेख़ौफ़ आजादी की नव नव तरंग
जीवन का सार
प्यार..प्यार..प्यार।”

(१९) . प्रेम -1 – राकेश मिश्र

जब तुमने कहा
सब कुछ छोड़ देना है
मुझे समझ लेना चाहिए था
तुम प्रेम में हो
मैं, ईश्वर, यह सृष्टि
और स्वयं तुम
प्रेम
कुछ भी रहने देता।

(२०). एक प्रेम कविता – बली सिंह

“मैंने तुम्हें देखा
तुम्हें नहीं
तुम्हारे मकान को देखा
मुझे एक मकान की
सख्त जरूरत थी।

मैंने तुम्हें पहचाना
तुम्हें नहीं
तुम्हारे बाप को पहचाना
मुझे एक पहचान की
सख्त जरूरत थी।

मैंने तुम्हें जाना
तुम्हें नहीं
तुम्हारे जिस्म को जाना
मुझे एक जिस्म की …….।”

(२१) . मैं प्रेम करती हूँ और ठिठक जाती हूँ – ज्योति चावला

तुम्हें प्रेम करने से मुझे रोकता है मेरा समय

कि जब-जब चाहती हूँ तुम पर प्यार लुटाना

न जाने कहाँ से कितने दृश्य हम दोनों के बीच आ खडे होते हैं

जिनमें छिपा रहता है कुछ इतना भयावह, इतना विद्रूप

कि प्रेम एकबारगी ग़ैरज़रूरी-सा लगने लगता है

इन दिनों जितना तेज़ होती जा रही है तलवारों की धार

कविता की धार भी उतनी पैनी हो गई है

बंदूक़ की नोंक पर खडे कर जहाँ किया जा रहा हो प्रेम

वहाँ तुम्हारे लिए लिखी प्रेम कविता में

मैं शर्म से धँसा लेती हूँ सिर

कि इस समय ने ख़ारिज कर दिया है प्रेम कविता को

ऐसे समय में जहाँ ज़िंदा रहने के लिए

ज़रूरी हो जाएँ प्रमाण-पत्र वहाँ

बिना किसी प्रमाण-पत्र के तुम्हारा प्रेम निवेदन

अप्रामाणिक ही तो है

अप्रामाणिक और अविश्वसनीय ही तो है

तुम्हारा मुझ पर सर्वस्व लुटा देना और

एक भी विज्ञापन न दिखना उसका शहर की दीवारों पर

इन दिनों विज्ञापनों से पटी है हवाएँ इस क़दर

कि चाह कर भी नहीं रख सकती इन पर

मैं एक चुंबन तुम्हारे लिए

इन दिनों खेतों में पनपने लगा है बारूद

कि मैं उनकी ओर बढ़ती हूँ और ठिठक जाती हूँ

फूलों से अधिक काँटे हैं डालियों पर इन दिनों

कि मैं बढ़ाती हूँ हाथ और लहूलुहान हो जाती हूँ

यह ज़मीन किसकी है, यह आसमान किसका है

किसका है यह पानी, यह आग किसकी है

चारों ओर फैले इस भयावह शोर में

घबरा जाती हूँ मैं और

बटोरने लगती हूँ इधर-उधर फैले स्पंदन

फूल, ख़ुशबुएँ

स्पर्श के एहसास बटोरने लगती हूँ मैं

बटोरने लगती हूँ अपने प्रेमपत्र जो

लिखे थे मैंने तुम्हारे लिए।

 

(२२). तुम्हारी मुहब्बत है या – अमरजीत कौंके

तुम्हारी मुहब्बत है
या आँधी है कोई मुँहज़ोर
जो पाँवों से उखाड़ कर ले गई मुझे
अपनी बाँहों में समेट कर

तुम्हारी मोहब्बत है
या तूफ़ान है कोई समुद्री
मुझे लहरों पर डूबते तैरते को
बहा के ले गया साथ अपने

तुम्हारी मुहब्बत है
या भँवर है तेज़ कोई
मेरी चेतना इस के भँवरजाल में
अपने होशहवास गुम कर बैठी है

तुम्हारी मुहब्बत है
या घोड़े हैं कई बेलगाम
जो मेरे भीतर दौड़ने लगे हैं
गरजते तूफ़ान की तरह

तुम्हारी मुहब्बत है
या अग्नि है कोई धू धू जलती
मेरी काया जिस में तप रही
मैं राख होता जा रहा हूँ
फिर से कुकनूस होने के लिये।

(२३). प्रेम में – रश्मि भारद्वाज

देह धरे ही प्रेम में उतरते रहे
देह उतार प्रेम करना नहीं आया
प्रथम आतुरता से प्रथम चुम्बन तक
स्पर्श ने मन को प्रेम समझाया
या मन ने ही स्पर्श को अनुमति दी
शरीर और आत्मा के सभी द्वंदों के बीच
यह प्रश्न सदैव अनुत्तरित रहा

यह ज़रूर पता रहा
जिस पल कोई छुअन बेसुआद लगी होगी
उसी किसी क्षण ने
प्रेम के मृत होने की सूचना दी थी

आत्मा को भी प्रेम का स्पर्श चाहिए
यह लिखते हुए सोचती हूँ
किताबों ने हमेशा इसे विपरीत क्रम में रखा है

प्रेम को आत्मा का स्पर्श चहिए
लेकिन उसमें एक शैतान भी बसता है
जिसके जुनूनी इरादों में अक्सर
आत्मा की बेचैन रजामंदी होती है
वह जानती है कि प्रेम से बढ़कर
कोई और गुनाह नहीं

उसने कहा
तुम प्रेम में हो
मैंने कहा
मैं साथ में हूँ
साथ होना प्रेम में होने से अधिक ज़रूरी है
साथ में दो अधूरे दुख मिलकर
एक पूरा सुख नहीं बनते
वे एक पूरा दुख बनकर
साथ सहे जाते हैं।

(२४) . जब तुम नहीं होती हो — रणविजय राव

वैसे ऐसा तो
कभी – कभार ही होता है
जब तुम नहीं होती हो ।

तुम्हारा न होना
रिक्तता से भर देता है
घर में बहुतों के , और
बहुत कुछ होते हुए भी ।

एक शून्य – सा लगता है
खालीपन – सा लगता है
जिसे नहीं भर सकता
कोई और ।

तुम भी जानती हो यह सब
पर पता नहीं क्यों
एक भ्रम का – सा
एहसास होता है तुम्हें
कभी – कभी
और बोलती भी तो हो तुम
कि मैं तो याद भी नहीं आती होऊंगी
बच्चे भी कहां याद करते हैं
कोई फोन भी तो नहीं करता ।

पर नहीं है ऐसा
जैसा तुम्हें लगता रहा है
तुम्हारे न रहने की स्थिति में
या जब तुम नहीं होती हो ।

जब तुम नहीं होती हो
तो तलाश होती है तुम्हारी
नज़र जाती है बार – बार
जहां तुम अक्सर बैठा करती हो
जाहं बैठकर अक्सर
निहारती हो मोबाइल
चेक करती हो मैसेज
वाट्सएप्प अथवा फेसबुक
या यू – ट्यूब पर खाना – खजाना भी ।

या फिर चली जाती है नज़र
रसोई घर में
जब तुम साड़ी का पल्लू
कमर में खोंसती हुई
उड़ेलती हो चाय प्याली में ।

या फिर वाश बेसिन पर भी
चली जाती है नज़र
जब तुम
मारती हो छीटे मुँह पर
बड़े ही निराले अंदाज में
या फिर लॉबी में
जब तुम समेटती हो
खुले बाल
बनाती हो जुड़ा ।

या फिर
जब कभी बनाता हूँ मैं
चाय या कुछ और चीज़
बड़े शौक से
और नहीं मिलती है कोई चीज़
चीनी , चाय
या कोई मसाले की डिबिया
तब झल्लाते हुए
और मुँह बनाते हुए
कुछ अजीब तरह से
या फिर बड़बड़ाते हुए
कुछ – कुछ
जब कहती हो –
” तुम्हें तो कुछ मिलेगा ही नहीं
इससे तो अच्छा होता
मैं खुद ही बना लेती । ”

तुम जब नहीं होती हो
तो जैसे नहीं आती
गौरैया सामने के पेड़ पर
जैसे सूरज छिप जाता है
बादलों के बीच
अंधेरा जैसे छा जाता है
दिन ढलने से पहले ही ।

सच में —
तुम जब नहीं होती हो
तो जैसे आवारा बादल
घुमड़ने लगता है
पूरे आसमान में
बिना बरसे इधर से उधर
देशवासियों को भ्रमित करते हुए
ठीक वैसी ही स्थिति होती है
मेरी भी
तुम जब नहीं होती हो ।

तुम हो तो सब कुछ है
तुम नहीं तो कुछ नहीं ।

तु नहीं तो
मज़ा नहीं पछुवा बयार का
तुम नहीं तो
स्वाद नहीं चाय में
तुम नहीं तो
एक शोर है शांति के बीच
तुम नहीं तो
उदासीन है समूचा वातावरण
तुम नहीं तो
एक चुप्पी है दीवारों के बीच ।

तुम नहीं तो
तिक्त हैं सारे एहसास
तुम नहीं तो
निरर्थक हैं वो सारी चीजें
जिनसे आती है सार्थकता जीवन में ।

सच में —
कुछ नहीं होता
जब तुम नहीं होती हो ।
——————————

(२५) .  सबसे सुंदर प्रेम कथाओं के नायक भगोड़े हुए या सन्यासी-लीना मल्होत्रा

सबसे सुंदर प्रेम कथाओं के नायक भगोड़े हुए या सन्यासी

जब प्रेमिकाओं के अश्रुओं से गल गई
सत्तर फीसदी पृथ्वी
उन्होंने तप किया उसी पत्थर पर जिसे छाती पर धरे प्रेमिकाओं ने चिरकाल तक की प्रतीक्षा।

गर्व के पर्वत जो चूर चूर हो समतल हुए
उसी बची हुई धरती पर
उन्होंने परम् मोक्ष के ध्वज फहराए और अमर हुए ।

उनकी अंतर्दृष्टि न देख पाई रक्तरंजित स्मृतियां जिसे बैकपैक की तरह उठाये वे वारांगनाएँ अंतरलोक की यात्रा पर निकल गईं
और फिर नहीं लौट पाईं अपनी ही देह में !!

 

(२६) . ‘एक पाती तुम्हारे नाम’ – प्रवीण कुमार

बरसों-बरस
सारे मौसम
दिन-रात
साथ जीते-जीते
हम हो गए
एकरूप-एकरंग
अब मुश्किल होता है
हमें अलग-अलग पहचानना
अलग-अलग सोचना
हमारी पसंद-नापसंद भी
अब हो गई हैं एक
गीत भी वही
स्वर भी वही
नृ्त्य की मुद्राएँ भी वही
बेशक, यह सिंफनी
घटित होती है
लाखों जोड़ों में कहीं-कहीं
फिर भी……
महसूस होता है कभी-कभी
थोड़ा नीरस और उबाऊ
अब मैं मिलना चाहता हूँ तुमसे
पार्क के किसी कोने में
करना चाहता हूँ
तुम्हारा इंतज़ार
टहलना चाहता हूँ
नदी किनारे
गीली रेत पर नंगे पाँव
पढ़ना चाहता हूँ साथ-साथ
कीट्स के प्रेम गीत
कालिदास का मेघदूतम्
चढ़ना चाहता हूँ
पहाड़ की चोटी पर
पकड़े हुए तुम्हारा हाथ
भटकना चाहता हूँ
किसी वीरान जंगल में
मैं चाहता हूँ
हम बारिश में भीग जाएँ
बिजली कड़क उठे
और तुम डर जाओ
और फिर……
मैं रहना चाहता हूँ ऐसी जगह
जहाँ कोई हमें पहचानता न हो
हम भी मिलें अजनबी की तरह
स्वतंत्र हो हमारा वजूद
दो ध्रुवों की तरह
महसूस करना चाहता हूँ
बराबर का स्पॉअर्क
देखते रहना चाहता हूँ तुम्हें
ताउम्र
एक प्रेमी की तरह।

(२७) . जब तुम दो टुकुर देखती हो – यतीश कुमार
———————————–

मन के अँखुआ में
कोंपल उग आता है

कविता से पंक्ति
हमारी ओर खिसक आती हैं

ज़ुम्बिश सी उठती है
मन की गिरह
थोड़ी और खुल जाती है

भँवर के क़ैद से
एक मछली
आज़ाद हो जाती है

मौसम जम्हाई लेता है
इन्द्रियाँ उनींदी होती हैं

सातों सुर एक साथ
शरमा कर आपस में लिपट जाते हैं

आलम से भरी घड़ी
मुस्कुरा उठती है

हौंस थोड़ी हूक
और बढ़ाती है

आँगन चैत के महुए से पट जाता है
आसमां कार्तिक के सितारों सा जगमगाता है

दरअसल जब तुम टुकुर- टुकुर देखती हो
तो लगता है
तुम मुझे देख नहीं
भींच रही हो।

(२८). प्रेम – रंजीता सिंह

तुम्हारा नाम लेते हीं
त्वरित तड़ित सी
उद्दीप्त कामनाएं
दौड़ जाती हैं
शिराओं में

महीनों सालों से जमा
रक्त प्रवाह
ऋषिकेश की गंगा की तरह
हाहाकार करने लगता है

प्रेम सूक्ष्मता से स्थूलता की ओर अग्रसर होताहै
तुम्हारी चाहना के अग्निकुंड में
किसी इच्छित समिधा सा मेरा आहूत होना
कितना अदभुत ,अलौकिक
और मोक्षमय है

जलती, बुझती राख होती मैं
कितनी प्रेममय
स्थितप्रज्ञ,शांत और संपूर्ण
हुई जाती हूँ
तुम्हारी स्मृति हीं
मेरे प्रेम की पराकाष्ठा है

कामना और प्रेम के ठीक
मध्य और चरम पर
जागृत कुंडलिनी अवस्था में
ध्यानमग्न जोगी की तरह
तुम्हारी सुध में
बेसुध होना हीं
प्रेम का चरमोत्कर्ष है।

(२९) . प्रेम राग- रमेश प्रजापति

तुम्हारी कोमल हथेली पर रखा
एक बर्फ का टुकड़ा हूँ

कुछ उड़ जाऊँगा भाप बनकर
कुछ फैल जाऊँगा पानी बनकर

फिर भी
हथेली पर रह जायेगी सिलवटें
जो तुम्हारे मन के किसी कोने में बैठी
सालती रहेगी ताउम्र

प्रेम एक ऐसा राग है
जो निर्जन में
झंकृत करता है साँसों के तार।

(३०) . प्रेम में डूबना जान पाया हूं – शिव कुशवाहा
———————
हवा के शीतल झोंके की तरह
तुम मेरे मानस में आकर ठहर गयी हो
मैं प्रेम के अनिवर्चनीय आनंद में डूबा
निहार रहा हूं तुम्हारे आस-पास अपनी परछाई

तुम्हारी हर एक बात ठंडी बयार की तरह
छू लेती है मेरे आर्द्र मन की गहराई
मैं पढ़ लेता हूं वह सब कुछ
जो तुमने मेरे लिए लिखा है
प्रेम की सुकोमल तूलिका से

मैं चलता रहा हूं तुम्हारे साथ
बादल की छाया लेकर कड़ी धूप में
और तुम
फूल के रंग में रंगी सुवासित हो रही हो
मेरे जीवन के बेरंग आयामों में

जैसे तेज़ हवाओं के साथ
बारिश की बूंदें धरती को कर देती हैं शीतल
उसी तरह तुम मेरे धूसरित हो रहे जीवन को
बना देती हो खुशनुमा
भर देती हो एक अमिट मुस्कान

प्रिये !
मैं प्रेम लिखना नहीं जानता था
और न प्रेम की कविता करना ही
किंतु प्रेम में डूबना जान पाया हूं
कि तुम्हारे प्रेम ने मुझे
कविता करना सिखा दिया है और प्रेम करना भी..।

(३१).जब आप प्रेम करते हैं – घनश्याम कुमार देवांश

“जब आप प्रेम करते हैं
तब आप दुनिया के निकम्मेपन और क्रूरता को
एक सरल मुस्कान से
जीत लेने के किस्से गढ़ते हैं
और विश्वास करने लगते हैं
कि इस बंजर होती धरती पर यकायक
पेड़ बढ़ जाते हैं
उन दिनों आपको एक कंक्रीट की बिल्डिंग भी
हरी नजर आती है और पैरों के नीचे
तपते डामर की काली सड़कें भी
महसूस होती हैं ठंडे छिछले तालाबों की तरह
तब आप एक टिमटिमाती रौशनी भर के
भरोसे पर एक भयानक लंबी सुरंग में
प्रवेश कर जाते हैं और उम्मीद करते हैं
कि आप उसे सौ फ़ीसदी पार कर ही लेंगे।”

(32). प्रेम – निशांत

“एक मीठे प्यास का दरिया
एक अतृप्त पथिक

दोनों वाचाल
मौन खड़े हैं।”

(३३) . प्रेम – आशुतोष श्रीवास्तव

प्रेम गन्ध ज्यों ही स्वीकारा,
बाकी सब कुछ गौण हो गया,
जाने कैसा यह जादू था
मूढ़ अचानक प्रौढ़ हो गया।

भाग रही है सारी दुनिया
जाने क्या क्या लक्ष्य सभी का,
प्रेम एक अनुभव है केवल,
शब्द न केवल प्रेम कवि का।
तुमने मुझको अपना माना,
मैं कुछ था, कुछ और हो गया।

प्रेम दिखा चहुँ ओर प्रकाशित
मानो तुम ही मुस्काती हो,
सुन्दर ध्वनि कुछ भी सुनता तो
क्यों लगता तुम ही गाती हो?
पहले मन विचलित रहता था
प्रेम नियत एक ठौर हो गया।

अक्सर मन संदेहग्रस्त था,
जीवन भी एक छल, माया,
प्रतिपल मैं सोचा करता था,
सत्य नहीं कुछ, यह इक छाया।
सत्य मात्र अहसास अभी का,
कल तो बीता दौर हो गया।

नहीं जरूरी मैं गाऊँ कुछ,
या लिख पाऊँ भाव हृदय का,
क्या कोई लिख या पढ़ सकता
अनहद अन्तर प्रेम विजय का।
तुमने पकड़ा हाथ जो मेरा
किंकर था सिरमौर हो गया।
जाने कैसा यह जादू था
मूढ़ अचानक प्रौढ़ हो गया।

(३४) . कच्चा -पक्का प्रेम – भरत कनफ

प्रेम न कच्चा होता है
न पक्का
होता है
कुछ- कुछ
इन दोनों जैसा
पकने पर टपक जाता है
“आम” की तरह
कच्चा होने पर
बन जाता है “बेर”
कसैला करता मुँह
अकड़ने पर टूट जाता है डंठल सा
झुकने पर खिल जाता फूल सा।

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