

दिल्ली नगर निगम और गुजरात हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनाव के नतीजे ने मिशन 2024 के संग में कई राजनीतिक संदेश दिए हैं। इसमें पहला संदेश यह है कि ब्रांड मोदी अब भी विपक्ष के लिए अबूझ पहेली है। बीते 8 सालों से ब्रांड मोदी के सामने नतमस्तक कांग्रेस के लिए आम आदमी पार्टी के रूप में दोहरी चुनौती खड़ी हुई है। हालांकि हिमाचल प्रदेश और दिल्ली के नतीजे ने भाजपा के अजय होने की छवि पर बट्टा लगा दिया है और यह साबित किया है कि स्थानीय मुद्दों के सहारे भाजपा के हिंदुत्व और राष्ट्रवाद और विकास का मुकाबला किया जा सकता है।
भले ही भाजपा को हिमाचल और दिल्ली नगर निगम की डेढ़ दशक पुरानी सत्ता गंवानी पड़ी है। मगर इससे भाजपा के मिशन 2024 की संभावना पर असर पड़ने की संभावना नहीं दिख रही है। इसका कारण ब्रांड मोदी की मजबूती और विशेषता बीते 8 साल से बरकरार रहने चुनाव में पीएम मोदी के ट्रंप कार्ड बने रहने के साथ आपकी कांग्रेस का विकल्प बनाने की बनती जा रही अवधारणा है। आप के विस्तार के संभावना ने आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा की संभावना को ही विस्तार दिया है। फिर ध्यान देने वाली बात यह है कि सत्ता विरोधी लहर के एक समय बहुत तेज होने के बावजूद भी भाजपा को वोट प्रतिशत और सीटों की दृष्टि से दिल्ली नगर निगम और हिमाचल चुनाव में कोई बड़ा नुकसान नहीं उठाना पड़ा है। हिमाचल में कांग्रेस को भाजपा की तुलना में महज 37974 मत आदा मिले जबकि दिल्ली निगम में भाजपा की सीटों की संख्या से ज्यादा है।
पुरानी पेंशन स्कीम भी कांग्रेस की जीत की एक वजह है।
बीते 8 सालों में जिस भी दल ने राज्य की अस्मिता और स्थानीय मुद्दों के सहारे भाजपा के राष्ट्रवाद हिंदुत्व और विकास का मुकाबला किया है। उसे सफलता मिली है हिमाचल प्रदेश और दिल्ली निगम चुनाव के नतीजे ने इसे साबित किया है। हिमाचल में कांग्रेस ने पुरानी पेंशन स्कीम बेरोजगारी जैसे स्थानीय मुद्दों के सहारे भाजपा का मुकाबला कर जीत हासिल किया है। इससे पहले भी दिल्ली पश्चिम बंगाल उड़ीसा जैसे राज्यों में स्थानीय मुद्दों के सहारे ही सत्र पर भाजपा से पार पा सके हैं।
