
- मोहन भागवत ने कहा कि समाज के अस्तित्व को बचाने के लिए 2.1 की प्रजनन दर (TFR) जरूरी है, जिसका व्यवहारिक अर्थ तीन बच्चे हैं।
- उन्होंने तर्क दिया कि तीन बच्चों वाले परिवार में बच्चे ‘ईगो मैनेजमेंट’ (अहंकार प्रबंधन) बेहतर तरीके से सीखते हैं।
- संघ प्रमुख ने चेताया कि जिस समाज की जन्म दर 2.1 से नीचे गिरती है, वह धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुँच जाता है।
कोलकाता, 22 दिसंबर: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने एक बार फिर देश की जनसंख्या नीति और परिवार व्यवस्था पर बड़ा बयान दिया है। कोलकाता में आयोजित एक व्याख्यानमाला के दौरान भागवत ने जनसंख्या के “गणित” को समझाते हुए तर्क दिया कि भारत के प्रत्येक परिवार में कम से कम तीन बच्चे होने चाहिए। उन्होंने इसे न केवल समाज की सुरक्षा बल्कि बच्चों के बेहतर मानसिक विकास और स्वास्थ्य के लिए भी आवश्यक बताया।
2.1 का गणित और समाज का अस्तित्व
मोहन भागवत ने जनसांख्यिकी विशेषज्ञों (Demographers) का हवाला देते हुए कहा कि किसी भी समाज को स्थिर बनाए रखने के लिए कुल प्रजनन दर (Total Fertility Rate) 2.1 होनी चाहिए। उन्होंने कहा, “गणित के हिसाब से 2.1 का निकटतम अंक 2 होता है, लेकिन मनुष्यों के जन्म के मामले में 2.1 का मतलब 3 होता है। अगर जन्म दर इससे नीचे गिरती है, तो वह समाज समय के साथ लुप्त हो जाता है।” उन्होंने दुनिया भर के उदाहरण देते हुए कहा कि कई देशों ने कम जन्म दर के कारण अपनी पहचान खो दी है।
‘ईगो मैनेजमेंट’ और स्वास्थ्य का लाभ
भागवत ने केवल आंकड़ों की ही बात नहीं की, बल्कि मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि जिस घर में तीन बच्चे होते हैं, वहां वे आपस में मिल-जुलकर रहना और एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बिठाना जल्दी सीखते हैं। उन्होंने कहा, “डॉक्टर और मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि तीन भाई-बहनों के साथ पलने वाले बच्चे ‘ईगो मैनेजमेंट’ में माहिर होते हैं, जो उनके भविष्य की पारिवारिक और पेशेवर जिंदगी के लिए बहुत जरूरी है।” साथ ही, उन्होंने सही उम्र (19-25 वर्ष) में विवाह और बच्चों को माता-पिता के स्वास्थ्य के लिए भी बेहतर बताया।
लिव-इन रिलेशनशिप और जिम्मेदारी पर प्रहार
अपने संबोधन में संघ प्रमुख ने आधुनिक जीवनशैली और ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ की भी आलोचना की। उन्होंने कहा कि लोग जिम्मेदारी लेने से डर रहे हैं। भागवत के अनुसार, विवाह और परिवार केवल शारीरिक संतुष्टि के साधन नहीं हैं, बल्कि यह समाज और परंपराओं को संरक्षित करने की एक संस्था है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी जिम्मेदारी से न भागें और समाज के निर्माण में योगदान दें।
संतुलन और भविष्य की चिंता
हालांकि भागवत ने तीन बच्चों की वकालत की, लेकिन उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जनसंख्या ‘ liability’ (बोझ) नहीं बननी चाहिए। उन्होंने कहा कि जनसंख्या का नियंत्रण और पर्याप्तता, दोनों के बीच संतुलन होना चाहिए ताकि देश के संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव न पड़े और हर बच्चे का पालन-पोषण ठीक से हो सके। यह बयान ऐसे समय में आया है जब देश में एक समान जनसंख्या नीति (Uniform Population Policy) को लेकर चर्चा गर्म है।
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