
नई दिल्ली, 8 अप्रैल: भारतीय सेना अपनी रक्षा सीमाओं को अभेद्य बनाने के लिए एक ऐसे ‘ब्रह्मास्त्र’ को शामिल करने जा रही है, जो आधुनिक युद्ध के मैदान में गेम-चेंजर साबित होगा। यह अगली पीढ़ी का एयर डिफेंस गन सिस्टम (ADGS)
युद्ध के बदलते स्वरूप और भारत की तैयारी
आज के समय में पारंपरिक युद्ध के साथ-साथ ‘ड्रोन वारफेयर’ का खतरा तेजी से बढ़ा है। रूस-यूक्रेन युद्ध और मध्य पूर्व के संघर्षों ने यह साफ कर दिया है कि सस्ते और आत्मघाती ड्रोन किसी भी आधुनिक सेना के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं। पाकिस्तान और तुर्की द्वारा विकसित किए जा रहे अत्याधुनिक ड्रोनों का मुकाबला करने के लिए भारतीय सेना अब अपने पुराने एयर डिफेंस सिस्टम को हटाकर इस नए ‘ब्रह्मास्त्र’ को अपना रही है।
क्या है यह नया एयर डिफेंस गन सिस्टम?
यह सिस्टम विशेष रूप से कम ऊंचाई पर उड़ने वाले खतरों को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें उन्नत इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल सेंसर और रडार तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। यह न केवल एक अकेले लक्ष्य को बल्कि ‘स्वार्म अटैक’ (दर्जनों ड्रोनों का एक साथ हमला) को भी ट्रैक कर उन्हें एक-एक कर तबाह कर सकता है।
तुर्की और पाकिस्तान के ड्रोनों का अंत
हाल के वर्षों में तुर्की के बायरकतार (Bayraktar) जैसे ड्रोनों ने वैश्विक स्तर पर चर्चा बटोरी है, जिनका इस्तेमाल पाकिस्तान भी अपनी ताकत बढ़ाने के लिए कर रहा है। लेकिन भारत का यह नया गन सिस्टम इन ड्रोनों के लिए काल साबित होगा। इसकी फायरिंग रेट इतनी तेज है कि यह एक सेकंड में सैकड़ों राउंड दागकर आसमान में ‘लोहे की दीवार’ खड़ी कर देता है, जिससे कोई भी मिसाइल या ड्रोन पार नहीं पा सकता।
आत्मनिर्भर भारत की एक और बड़ी जीत
यह एयर डिफेंस सिस्टम ‘मेक इन इंडिया’ की दिशा में एक बहुत बड़ा कदम है। इसका अधिकांश हिस्सा स्वदेशी तकनीक से विकसित किया गया है, जिससे युद्ध की स्थिति में विदेशी कलपुर्जों पर निर्भरता कम होगी। यह सिस्टम डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम से लैस है, जो मानवीय हस्तक्षेप के बिना भी सटीक निशाना लगा सकता है।
रणनीतिक महत्व और भविष्य की चुनौतियां
भारतीय सेना की योजना इस सिस्टम को न केवल एलओसी (LoC) बल्कि चीन से सटी वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर भी तैनात करने की है। दुर्गम पहाड़ियों और ठंडे इलाकों में भी यह सिस्टम पूरी सटीकता के साथ काम करने में सक्षम है। इसकी गतिशीलता (Mobility) इसे और भी खतरनाक बनाती है, क्योंकि इसे ट्रक या टैंक चेसिस पर माउंट करके कहीं भी ले जाया जा सकता है।
आधुनिक युद्धकला में एयर डिफेंस की भूमिका
आधुनिक युद्ध के मैदान अब केवल पैदल सैनिकों या टैंकों तक सीमित नहीं रह गए हैं। आज का युद्ध ‘सेंसर’ और ‘सिस्टम’ का युद्ध है। यदि आपके पास एक मजबूत एयर डिफेंस नहीं है, तो आपकी सबसे बड़ी सेना भी कमजोर पड़ सकती है। भारत के पास वर्तमान में ‘आकाश’ और ‘एस-400’ जैसे सिस्टम हैं, लेकिन ‘क्लोज-इन वेपन सिस्टम’ (CIWS) की जरूरत हमेशा बनी रहती है। यह नया गन सिस्टम इसी कमी को पूरा करता है।
स्वार्म ड्रोन तकनीक का मुकाबला
स्वार्म ड्रोन एक साथ सैकड़ों की संख्या में हमला करते हैं। महंगी मिसाइलों से छोटे ड्रोनों को मारना आर्थिक रूप से नुकसानदेह होता है। ऐसे में यह नया गन सिस्टम किफायती और सटीक समाधान प्रदान करता है। इसमें इस्तेमाल होने वाली गोलियां ‘प्रोग्रामेबल’ होती हैं, जो लक्ष्य के पास जाकर फटती हैं और छर्रों की मदद से ड्रोन को नष्ट कर देती हैं।
रडार और पहचान की क्षमता
इस सिस्टम की सबसे बड़ी खूबी इसका रडार है। यह ‘लो आरसीएस’ (Low Radar Cross Section) वाले लक्ष्यों को भी पहचान लेता है। इसका मतलब है कि अगर दुश्मन कोई ऐसा ड्रोन भेजता है जो रडार की नजर से बचने के लिए बनाया गया है, तो भी यह सिस्टम उसे पकड़ लेगा।
पाकिस्तान और तुर्की का गठबंधन और भारत की सतर्कता
तुर्की की ड्रोन तकनीक और पाकिस्तान का भारत विरोधी एजेंडा एक गंभीर सुरक्षा चुनौती पेश करता रहा है। तुर्की के ड्रोन लीबिया और अज़रबैजान के युद्धों में काफी सफल रहे थे। भारत ने इस खतरे को भांपते हुए अपनी ‘शॉर्ट रेंज एयर डिफेंस’ को अपग्रेड करने का फैसला किया है।
परीक्षण और तैनाती की योजना
आने वाले समय में राजस्थान के रेगिस्तानों से लेकर लद्दाख की ऊंचाइयों तक इस सिस्टम का परीक्षण किया जाएगा। सेना का लक्ष्य इसे एक एकीकृत नेटवर्क (Integrated Air Defense Network) से जोड़ना है, ताकि पूरे देश की हवाई सुरक्षा एक ही डैशबोर्ड से संचालित हो सके।
भारतीय सेना का यह नया एयर डिफेंस सिस्टम रक्षा के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत है। यह न केवल देश की सीमाओं को सुरक्षित करेगा बल्कि दुश्मनों के मन में यह खौफ भी पैदा करेगा कि भारत की वायु सीमा को लांघना अब नामुमकिन है। आने वाले कुछ महीनों में इसके व्यापक परीक्षण और फिर सेना में आधिकारिक शामिल होने की प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी।
