
- गिरिडीह के राजेंद्र यादव का मुंबई के दहिसर में आकस्मिक निधन, घर में छाया मातम।
- झारखंडी एकता संघ ने 24 घंटे के भीतर कागजी कार्रवाई पूरी कर शव को हावड़ा मुंबई मेल से भेजा।
- संघ ने अब तक 275 प्रवासी मजदूरों के पार्थिव शरीर को झारखंड पहुँचाकर पेश की है मिसाल।
मुंबई/गिरिडीह, 23 दिसंबर: रोजगार की तलाश में अपने घर-द्वार से दूर दूसरे राज्यों में जाने वाले झारखंडी मजदूरों की नियति में जैसे संघर्ष और त्रासदी ही लिखी है। ताजा मामला मुंबई का है, जहाँ गिरिडीह जिले के बिरनी थाना क्षेत्र के ग्राम नावाडीह (पंचायत अरारी) निवासी 35 वर्षीय राजेंद्र यादव का आकस्मिक निधन हो गया। राजेंद्र यादव पिछले कुछ समय से रोजगार की तलाश में मुंबई के दहिसर ईस्ट इलाके में रह रहे थे और ऑटो रिक्शा चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे थे। उनकी मृत्यु की खबर मिलते ही गिरिडीह स्थित उनके पैतृक गांव में मातम छा गया है।
तनाव में थे घर के अकेले कमाऊ सदस्य
राजेंद्र यादव अपने पीछे पत्नी पिंकी देवी, दो पुत्र और एक पुत्री को छोड़ गए हैं। परिजनों के अनुसार, वह पिछले कुछ दिनों से मानसिक तनाव में चल रहे थे। घर के अकेले कमाऊ सदस्य होने के नाते उन पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी थी। 21 दिसंबर 2025 को उनके निधन की खबर ने पूरे नावाडीह गांव को झकझोर कर रख दिया। पत्नी और बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है, क्योंकि उनके सामने अब भविष्य का गहरा संकट खड़ा हो गया है।

झारखंडी एकता संघ ने संभाली जिम्मेदारी
घटना की सूचना मिलते ही मृतक के परिजनों ने पिछले दो दशकों से प्रवासियों के हित में काम करने वाली संस्था ‘झारखंडी एकता संघ’ से संपर्क किया। संघ के केंद्रीय सदस्य तौफीक अंसारी और बोरीवली इकाई अध्यक्ष भीम कुमार गुप्ता (भीम साव) ने तुरंत मोर्चा संभाला। शव को मुंबई से झारखंड ले जाना एक बड़ी आर्थिक और प्रशासनिक चुनौती थी।
संघ के पदाधिकारियों—मंटु मोदी, जसमुद्दीन अंसारी, पवन मिस्त्री, राजू पासवान और बोरीवली ऑटो रिक्शा टैक्सी चालक संगठन के उपाध्यक्ष इशाक मुल्ला ने न केवल परिवार को ढांढस बंधाया, बल्कि आर्थिक सहयोग भी जुटाया। सभी के सामूहिक प्रयासों से 22 दिसंबर 2025 को राजेंद्र यादव के पार्थिव शरीर को सम्मानपूर्वक हावड़ा मुंबई मेल के जरिए उनके गांव के लिए रवाना किया गया।
सरकार की उदासीनता और पलायन का दंश
झारखंडी एकता संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष असलम अंसारी और कार्यकारी अध्यक्ष फिरोज आलम ने इस घटना पर गहरा दुख व्यक्त करते हुए राज्य सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि झारखंड खनिज संपदा से परिपूर्ण होने के बावजूद आज अपने ही मजदूरों को रोजगार देने में विफल है। “विधायक, सांसद और मंत्री केवल चुनाव के समय वोट मांगने आते हैं, लेकिन जब कोई मजदूर विदेश या अन्य राज्यों में मुसीबत में होता है, तो मदद के नाम पर केवल खोखले आश्वासन मिलते हैं।”
प्रवासी कल्याण आयोग के गठन की मांग
संस्था ने बताया कि वे पिछले 18 वर्षों से सरकार से ‘प्रवासी कल्याण आयोग’ के गठन की मांग कर रहे हैं। संघ अब तक 275 प्रवासी मजदूरों के शव उनके गांव पहुँचा चुका है। पदाधिकारियों ने कहा कि यदि आयोग का गठन होता है, तो बाहर रह रहे मजदूरों को सुरक्षा और तत्काल सहायता मिल सकेगी। सलीम अंसारी, विनोद प्रसाद, ताज हसन अंसारी और संतोष कुमार जैसे संघ के अन्य सदस्यों ने भी वर्तमान सरकार की उदासीनता को झारखंडियों का दुर्भाग्य बताया।
यह घटना एक बार फिर उस कड़वे सच को उजागर करती है कि झारखंड के हजारों युवा आज भी विस्थापन और पलायन का दंश झेल रहे हैं, जहाँ उनकी सुध लेने वाली एकमात्र शक्ति स्वयंसेवी संस्थाएं ही रह गई हैं।
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