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एमपी का एक ऐसा मन्दिर जहां हरसिद्धि देवी मां की मूर्ति दिन में तीन बार रुप बदलती हैं।

 सागर जिले के रहली के रानगिर धाम में विराजी मां हरसिद्धि तीन रूप में दर्शन देती हैं। सागर से करीब साठ किलोमीटर दूर नरसिंहपुर सड़क मार्ग से आठ किलोमीटर अंदर प्राकृतिक वातावरण हरे भरे पेड़ पौधे के बीच में स्थित प्रसिद्ध तीर्थ क्षेत्र रानगिर धाम अपने आप में एक विशेषता समेटे हुए है। देहार नदी के तट पर स्थित इस इतिहासिक व प्राचीन मंदिर में विराजी मां हरसिद्धि देवी की मूर्ति दिन में तीन स्वरुपों में दर्शन देती हैं। प्रात: काल मे कन्या, दोपहर में युवा और सायंकाल प्रौढ़ रुप में माता के दर्शन होते है। जो सूर्य, चंद्र और अग्नि इन तीन शक्तियों के प्रकाश, तेज तथा अमृत का संकेत है। लोककथा के अनुसार देवी भगवती के 51 सिद्ध शक्ति पीठों में से एक शक्तिपीठ है सिद्ध क्षेत्र रानगिर धाम । यहां पर सती की रान गिरी थी। इस कारण यह क्षेत्र रानगिर कहलाया। रानगिर का यह मंदिर लगभग ग्यारह सौ (1100) वर्ष पुराना है। इस धाम के बारे में कहा जाता है की यह मंदिर पहले रानगिर में नहीं था, नदी के उस पार देवी हरसिद्धि मां रहती थी। मंदिर के पुजारी पं. अनिल कुमार दुबे शास्त्री के अनुसार किवदंती है कि मंदिर पहले रानगिर में नहीं था। देहार नदी के उस पार हरसिद्धि मां रहती थीं। देवीमाता कन्याओं के साथ खेलने के लिए आया करती थीं। शाम को उन्हें एक-एक चांदी का सिक्का देकर अपने स्थान पर चली जाती थीं। एक दिन ग्रामीणों ने देखा कि यह कन्या सुबह खेलने आती है और शाम को कन्याओं को एक चांदी का सिक्का देकर बूढ़ी रानगिर धाम को चली जाती है। उसी दिन देवी हरसिद्धि माता ने सपना दिया कि मैं हरसिद्धि माता हूं, बूढ़ी रानगिर में रहती हूं। यदि बूढ़ी रानगिर से रानगिर में ले जाया जाए, तो रानगिर हमारा नया स्थान होगा। जैसे ही ग्रामीण धाम पहुंचे, बूढ़ी रानगिर में बेल वृक्ष के नीचे हरसिद्धि मां की प्रतिमा मिली। लोग बेल की सिंहासन पर बैठाकर उन्हें शाम के समय रानगिर लाए। दूसरे दिन लोगों ने उठाने का प्रयास किया कि आगे की ओर ले जाया जाए, लेकिन देवी हरसिद्धि मां की मूर्ति को हिला नहीं सके। रानगिर मंदिर के पुजारी अनिल शास्त्री ने बताया कि हरसिद्धि माता के बारे में और भी कई किवदन्तियां प्रचलित हैं। एक लोक कथा के अनुसार रानगिर में एक चरवाहा (ग्वाला) हुआ करता था। चरवाहे की एक छोटी बच्ची थी। बच्ची के साथ एक वन कन्या रोज आकर खेलती थी एवं अपने साथ खाना कराती थी और रोज एक चांदी का सिक्का देती थी। चरवाहे को जब इस बात की जानकारी लगी तो एक दिन छुपकर दोनों कन्या को खेलते देख लिया चरवाहे की नजर जैसे ही वन कन्या पर पड़ी तो उसी समय वन कन्या ने पाषाण(पत्थर) रूप धारण कर लिया। बाद में चरवाहे ने कन्या का चबूतरा बना कर उस पर छाया आदि की और यहीं से मां हरसिद्धि की स्थापना हुई।पंडित कृष्णकुमार दुबे ने बताया कि देवी भगवती के 51 शक्ति पीठों में से एक रानगिर भी है। मान्यता है कि यहां माता सती की रान (जांघ) गिरी थी, इसलिए इस क्षेत्र का नाम रानगिर पड़ा। माता के दर्शन करने से भक्तों की मनोकामना पूरी होती है। मंदिर के छोटे पुजारी पं. अनिल दुबे ने बताया कि मेरा परिवार दस पीढ़ियों से मंदिर में माता की सेवा कर रहा है। पहले मां हरसिद्धि नदी के उस पार बूढ़ी रानगिर में थी। माता पहले कन्या के रूप में खेलने आती थी। इसके बाद मां यहीं रुक गईं। इसके बाद माता के मंदिर का भव्य निर्माण कराया गया। नदी के उस पार भी बूढ़ी रानगिर में माता का मंदिर है। हरसिद्धि माता के दरबार में पहुंचने के लिए जिला मुख्यालय सागर से दो तरफा मार्ग है। सागर, नरसिंहपुर नेशनल हाइवे पर सुरखी के आगे मार्ग से बायीं दिशा में आठ किलोमीटर अंदर तथा दूसरा मार्ग सागर-रहली मार्ग पर पांच मील नामक स्थान से दस किलोमीटर दाहिनी दिशा में रानगिर स्थित है।

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