
- द्रमुक (DMK) ने संकेत दिए हैं कि यदि केंद्र सरकार उनकी मुख्य मांगें मान ले, तो वे परिसीमन विधेयक पर एनडीए का समर्थन कर सकते हैं।
- पार्टी ने लोकसभा सीटों की मौजूदा फ्रीज अवधि बढ़ाने और दक्षिण राज्यों के हितों के संरक्षण की शर्त रखी है।
- इस राजनीतिक हलचल से संसद में आगामी विधायी संशोधनों और संख्या गणित के समीकरण तेजी से बदल सकते हैं।
नई दिल्ली, 31 अगस्त: भारतीय राजनीति के गलियारों में इन दिनों एक नया सियासी समीकरण तेजी से चर्चा का विषय बना हुआ है। देश के आगामी विधायी एजेंडे और संभावित परिसीमन (Delimitation) प्रक्रिया को लेकर द्रमुक (DMK) के रुख में बदलाव देखने को मिल रहा है। राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, यदि केंद्र सरकार दक्षिण राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखने और कुछ चुनिंदा शर्तों को पूरा करने पर सहमत होती है, तो द्रमुक संसद में एनडीए सरकार का समर्थन करने पर विचार कर सकती है। हालांकि पार्टी की ओर से अभी अंतिम मुहर लगना बाकी है, लेकिन इस रणनीतिक बदलाव ने राष्ट्रीय राजनीति में सरगर्मी बढ़ा दी है।
द्रमुक की मुख्य मांगें और शर्तें
सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, द्रमुक ने परिसीमन विधेयक के संदर्भ में केंद्र के सामने मुख्य रूप से तीन बड़ी शर्तें रखी हैं। पहला यह कि लोकसभा सीटों का जो मौजूदा फ्रीज (Freeze) 1971 की जनगणना के आधार पर तय है, उसे अगले 25 वर्षों के लिए और बढ़ाया जाए। दूसरा, पार्टी चाहती है कि सभी राज्यों में लोकसभा सीटों में एकसमान रूप से 50 प्रतिशत की वृद्धि की जाए, जिससे किसी भी दक्षिणी राज्य के प्रभाव में कमी न आए। तीसरी और अंतिम मांग यह है कि सरकार विधेयक पेश करने से पहले संशोधित निर्वाचन क्षेत्रों की पूरी सूची और पारदर्शिता सुनिश्चित करे।
संसद में अंकों का खेल और राजनीतिक महत्व
संसदीय गणित के लिहाज से द्रमुक का यह संभावित रुख बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। संविधान संशोधन से जुड़े मामलों में संसद के दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है। लोकसभा में जहां एनडीए को अपने दम पर पर्याप्त आंकड़े जुटाने के लिए अतिरिक्त समर्थन की दरकार होती है, वहीं द्रमुक के 22 लोकसभा सांसद सरकार के संख्या बल को काफी मजबूत कर सकते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि सरकार इन क्षेत्रीय चिंताओं का समाधान ढूंढ लेती है, तो संसद में विधायी कार्यों को सुगमता से पारित कराना आसान हो जाएगा।
दक्षिण भारत में राजनीतिक संतुलन की चुनौती
दक्षिण राज्यों में हमेशा से यह डर रहा है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने के कारण यदि केवल जनसंख्या के आधार पर परिसीमन हुआ, तो संसद में उनकी सीटें और राजनीतिक वजन कम हो जाएगा। द्रमुक इसी बात का पुरजोर विरोध करती रही है। हालांकि, हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और नए गठजोड़ों के बाद, पार्टी व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाते हुए बातचीत के जरिए समाधान चाहती है। यदि केंद्र सरकार इन वार्ताओं में सफल होती है, तो यह देश के संघीय ढांचे और विधायी सुधारों की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित हो सकता है।
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