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होली का विज्ञान: बैक्टीरिया के खात्मे से लेकर कलर थेरेपी तक, जानिए होली मनाने के 4 बड़े वैज्ञानिक कारण

17 मार्च की रात को होलिका दहन होगा और 18 मार्च को रंगों से होली खेली जाएगी. यह त्योहार राक्षस हिरण्यकश्यप पर भगवान विष्णु की जीत के साथ-साथ राधा और कृष्ण के प्रेम का जश्न मनाता है। हालांकि भारतीय संस्कृति के इस त्योहार को मनाने के सिर्फ सांस्कृतिक कारण ही नहीं हैं।

होली मनाने के पीछे कुछ जैविक और पर्यावरणीय कारण भी हैं, जो आपको हैरान कर देंगे। आइए जानते हैं उन्हें..

1. होलिका दहन द्वारा कीटाणुओं का उन्मूलन
आग की गर्मी हमारे शरीर पर मौजूद कीटाणुओं को मार देती है।
मान्यताओं के अनुसार होलिका को आग में न जलने का आशीर्वाद मिला था, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से वह जल गई और प्रह्लाद बच गया। इसलिए आज भी होलिका की मूर्ति जलाने की परंपरा है।

हालांकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह परंपरा पर्यावरण में मौजूद बैक्टीरिया को खत्म कर देती है, क्योंकि इस मौसम में इनकी वृद्धि जल्दी हो जाती है। होलिका दहन के समय परिक्रमा करने की भी परंपरा है। आग की गर्मी हमारे शरीर पर मौजूद कीटाणुओं को भी मार देती है।

2. होली की राख को माथे पर लगाने से लाभ होता है
कुछ लोग होलिका दहन के बाद अपने माथे पर राख लगाते हैं।
देश के कुछ हिस्सों में लोग होलिका दहन के बाद अपने माथे पर राख लगाते हैं। इसके साथ ही इसमें चंदन और आम के पत्ते और फूल भी मिलाए जाते हैं। माना जाता है कि यह परंपरा अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देती है। इसके अलावा राख लगाने से हमारे अंदर और घर की नकारात्मकता भी दूर होती है।

3. लोक संगीत थकान दूर करता है
त्योहार के दौरान पारंपरिक गीत गाकर लोगों का शरीर तरोताजा हो जाता है।
होली के दौरान बदलते मौसम की वजह से लोगों को थकान और सुन्न महसूस होना आम बात है। इस थकान को दूर करने के लिए त्योहार के दौरान विभिन्न पारंपरिक गीत जैसे जोगिरा, फाग आदि गाए जाते हैं। इनके साथ ढोल और मंजीरा का भी प्रयोग किया जाता है। इन चीजों से लोगों का शरीर तरोताजा हो जाता है।

4. रंग चिकित्सा प्राकृतिक रंगों से की जाती है
होली खेलने के लिए शुरू से ही प्राकृतिक चीजों से रंग बनाए जाते हैं।
आज के दौर में रासायनिक रंगों का प्रयोग बढ़ गया है। हालांकि होली खेलने के लिए शुरू से ही प्राकृतिक चीजों से रंग बनाए जाते हैं। इसके कई स्रोत हैं जैसे पलाश का फूल, नीम, हल्दी आदि। आयुर्वेद में इनका उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है।

प्राकृतिक रंगों से खेलने से शरीर की चोट जल्दी ठीक हो जाती है। साथ ही ये अच्छी त्वचा और खूबसूरती के लिए भी फायदेमंद होते हैं। रंग खेलने के दौरान होने वाली शारीरिक हलचल से शरीर को ऊर्जा मिलती है।

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